दिल ही जाने

दिल ही जाने दिल का ग़म हम सराया क्या जाने,
दर्द़ अपने जख़्म भी अपने कोई पराया क्या जाने!

देखता हैं ख़ुद चुपके आईना कोई शीशा क्या जाने,
देख कर ख़ुदग़र्ज़ ए साँया कोई हँसाया क्या जाने!

मर्ज़ हैं ख़ुदाया ए मोहब्बत कोई बचाया क्या जाने,
जूझ़ रहा है मौत से अपने कोई रुलाया क्या जाने!

दैर ओ हरम में रहने वालों कोई सीखाया क्या जाने,
इन्सान हो तुम इन्सान बनों कोई सताया क्या जाने!

मुख़्तसर हैं यह जिंदगी मोहब्बत निभाना क्या जाने,
नींद में चलने वालों को अब कोई जगाया क्या जाने!

धूप में चलतें चलतें झ़ील तक क़दम चलें तो चलें,
प्यासे की प्यासा समंदर प्यास बुझाना क्या जाने!

नाम लेता है हर कोई किसी का उनके मरने के बाद,
रहतें हैं हम साथ मगर दोस्त हाथ मिलाना क्या जाने!

दिल की बातें पत्थर को कोई समझाया क्या जाने,
किसने हैं किस को बनाया कोई ख़ुदाया क्या जाने!

झ़ील

क्यूँ

मुझे ग़म नहीं है कि तु चला गया,

क्यूँ ज़हर जिंदगी में मिला कर गया!

मोहब्बत ने मुसाफ़िर बना दिया,

क्यूँ क़रीब से परदा हटा कर गया!

कभी इतना प्यासा तो नहीं था मैं,

क्यूँ इश्क़ ए जाम पिला कर गया!

मैं रेत से परे था मेरे हमदर्द़ मगर,

क्यूँ सहरा में ग़ुल खिला कर गया!

मुझे तुझसे कोई उम्मीद़ तो न थी,

क्यूँ सर से क़फ़न उठ़ा कर गया!

मुझे नींद में ख़याल आते थे लेकिन,

क्यूँ जमीन पे सितारें सजा कर गया!

ग़म ए दिल की आरजू थी झ़ील,

क्यूँ हौसला बुलंद़ भला कर गया!

इस दुनिया को मेरी पहचान न थी,

क्यूँ नाम अपना बहाल़ कर के गया!

हमने भी सिखा था ज़माने से जीना,

क्यूँ जान ए दिल हलाल़ कर गया!

झ़ील

आरज़ू

ग़म ए दिल की आरजू थी के इसे दवा मिलें कोई,
भडक जायें दिल की चिंगारी इसे हवा मिलें कोई!

आजमाया हर किसी ने सिर्फ़ मतलब की ख़ातिर,
छोड़ दूँ यह दुनिया मुन्तज़िर इसे जवाँ मिलें कोई!

हार गया हूँ मैं तो वैसा भी अब किसे गिला करूँ,
जित अगर मैं जाऊँ तो भी इसे अवाम मिलें कोई!

होश में हूँ मैं जानेमन होश शायद तुझको नहीं है,
बिख़र जाऊँ तिनका तिनका इसे धुवाँ मिलें कोई!

बदल जाऊँगा मैं अपनी राहें बेख़बर इस क़दर,
हर राहों पर हर इन्सान में इसे इमान मिलें कोई!

झ़ील

चलतें चलतें

चलते चलते यूँ मुड़ कर देखना तेरा अच्छा लगता है,

हसीन अदा ओं के सामने दिल मेरा बच्चा लगता है!

कितनों ने चाहा और पुजा फ़िर भी ग़ौर न किया तुने,

न देखीं अमीरी न ग़रीबी मेरी तेरा प्यार सच्चा लगता है!

देखा तुझको और लिखा भी किताब के हर पन्नों पर,

लेकिन हर पन्नों पर हर क़लाम मेरा कच्चा लगता है!

झ़ील

जय जवान

जय जवान

जय जवान

जय जवान

जय जवान

जय जवान मेरे वतन की

तु शान है तु जान है ईमान है

तु है तो सारा संसार है

मेरे देश की तु कमान है!

आँधीयाँ आयेंगी कितनी

तु रोकने उसे सक्षम है

वादियों में चट्टानों से खडा है

बाजू ओं ए फ़ौलादी दम है!

देश की हर मुश्किल घडी में

रहता है तु ख़ुदा से आगे

हर धर्म का है सलाम तुझे

हे इश्वर तुझको नमन् हैं!

फूलों में हैं खुशबु जैसी

हर दिल पे तेरा राज है

धड़कन है तु जिस ममता की

उस माँ का तु अभिमान है!

झ़ील

जिंदगी

  • जुबाँ होती अगर तुझको यह जिंदगी नुमाईश़ नही होती,
  • हर जगह मौजूद होकर भी इस तरह ख़ामोश नही होती!
  • रो पड़ा हैं हर कोई तुझको पाकर मंदिर के सीढी पर,
  • फूल और सिक्के तुझको चढ़ाकर नवाज़िश नही होती!
  • देखिये जरा हर किसी को यहाँ अपनी आँखें खोल कर,
  • ऊँच नीच का भेद ना होता मरने की ख़्वाहिश ना होती!
  • सभी को हैं ग़म इस बात का और सभी को हैं इंतज़ार,
  • चलतें फिरतें गले लगातीं यूँ पाने की कोशिश़ ना होती!
  • भला कौन है इस दुनिया में तुझसे जो मुझे बेहतर समझे,
  • तु हीं हैं दुनिया में सब से हँसीन वरना क़शिश़ ना होती
  • झ़ील

क़शिश = आकर्षण उम्मीद

नवाज़िश = खातिरदारी

नुमाईश़= खातिरदारी

Poetry

जिंदगी यह जिंदगी अब तो आजमाना छोड़ दे,
आँसू ओं मुस्सलसल् दिल से लगाना छोड़ दे!

अपने अपने कह के ज़हर झ़ील में मिला दिया,
आँधीयों करों क़रम के वादीयाँ जलाना छोड़ दे!

है मोहब्बत मुझको वतन के लोगों से कह दे,
मेरे दोस्तों को ही अब दुश्मन बनाना छोड़ दे!

शान है और इमान है दुनिया में हिन्दुस्तान मेरा,
मज़हब के नाम पर बच्चों को ड़राना छोड़ दे!

हाथों में नादान बच्चों के देते हैं हथियार क्यों,
कच्चे ख्व़ाबों की आँखों में जन्नत सजाना छोड़ दे!

कहीं ऐसा न लगें की जीने की तमन्ना ना रहें,
अन्जाना कह कर मेरी लाश को जमाना छोड़ दे!

चाहता नहीं था वह के हम फिर मिलेंगे कभी,
जुदा किया था जिसने उनकों ही पूछना छोड़ दे!

जो बीत गया सो बीत चुका नई सुबह आने दे,
इन्सान हो तुम इन्सान बनो ख़ुदा बनना छोड़ दे

झ़ील

कुछ दर्द़

शोलों पर चलतें चलतें चिराग़ ए दिल में जलायें रखा,
ठुकरा दिया सभी ने मगर सब से दिल से मिलायें रखा!

देखा किया सभी ने मगर हर सवाल चुप सा रह गया,
दर्द छुपाया दिल में मगर सब को दिल से हँसायें रखा!

ग़म का हमने कहीं भी इश्तेहार कभी किया नहीं है,
आसमान में देखते देखते अपने दिल को बहलायें रखा!

तिर दिल से पार हुआ मगर उसने कभी देखा नहीं,
जख़्म तो सुखे नहीं मगर एहसास दिल में जगायें रखा!

जब आया वह सामने देख कर भी अनदेखा किया,
होठों पर आतें आतें हर अल्फ़ाज़ दिल में दबायें रखा!

चार दिवारों में घूँट घूँट कर मोती टूट कर बिख़र गया,
फ़ासला था उनसे मगर दोस्ताना दिल से बनायें रखा!

जब भी गयें हम महफिल हमने सब से हाथ मिलाया,
चाँद देख कर हमने आँसु ओं को दिल से किनारें रखा!

झ़ील

क़ायनात

चलतें हैं तो सारी क़ायनात लिये चलतें हैं,
सर से हमारे हुक़्म ए सरताज़ लिये चलतें हैं!

जब कभी निकलतें है वह अपने घर से,
चलतें चलतें रास्ते का अंदाज़ लिये चलतें हैं!

चूराई है माहताब़ ने आँखों से नींद मेरी,
खामोशी में दिल ए आफ़ताब लिये चलतें हैं!

खूब उसका ही चलता है चर्चा शहर में,
अपने होठों पर वह मुस्कुराहट लिये चलतें हैं!

बंद रहतें है आजकल शायर चार दिवारों में,
ख़ुद वह बेबाक़ यहाँ आजादी लिये चलतें हैं!

झ़ील

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