ग़ज़ल

जब भी आये हो तुम ख़यालों में आँसू बन कर,

मेरी मज़ार तक आयें हो ख़ुशबू बन कर!

हमनें सोचा था चाँद ए रोश़नी आयेगी मुझ तक,

रह गयी सराब़ों ए मोहब्बत आरजू बन कर!

तुम तो दुनिया में सबसे हँसीन हो मगर फ़िर भी,

दोस्ती क्या निभाई हैं तुमने दुश्मन बन कर!

बनाया है जिसने तुझको वह बहोत ख़ुश होगा,

क्या द़गा दिया इश्क़ ए ख़ुदा तराजू बन कर!

यह मोहब्बत के ख़ुदा बनाता है मिटाता क्यूँ है,

हर मोहब्बत हैं क़िताबों में जुस्तजू बन कर!

तेरा घर तेरी गलियाँ एक तरफ़ हैं देर ओ हरम,

किसे सुनातें हाल ए दिल रूबरू बन कर!

मैं सोचता हूँ कि इस भीड़ में कैसे याद रखता है,

झ़ील सहता हैं ख़ामोशी बेज़ुबान बन कर!

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वह बात नहीं है

सब कुछ हैं जैसा था मगर वह बात नहीं है,

आयें दिन झ़ील पे मगर वह क़यामत नहीं है!

देख कर धूप में जिन्हें बादल भी गरज़ते थे,

आती हैं हर रोज़ मगर वह बरसात नहीं है!

देता है हर कोई अपनी अपनी राय हमकों,

सुन लिया चुपचाप मगर वह वक़ालात नहीं है!

बरसों कुछ साल पहले कोई रूका था यहाँ,

शुरुआत ख़ास थी मगर वह मुलाक़ात नहीं है!

पहले हम भी कुछ आपकी तरह आवारा थे,

दोहरायें फ़िर से मगर वह हिमाक़त नहीं है!

मोहब्बत ए ख़यालों की बातें पुरानी नहीं है,

करतें हैं आज भी मगर वह सवालात नहीं है!

जाहिर भी करें अगर तो जमाने से किस तरह,

आता है हर रोज़ मगर वह करवाचौथ़ नहीं है!

बातें पुरानी

वह गलीयाँ वह चौराहें और वह ख्व़ाब आसमानी,

बुजुर्गों ने पढ़ाई हैं पहले वह जज़्बात की कहानी!

उनकों देख देख कर कुछ रंग जुबान पर चढ़ गये,

वह रंग बदलते रहे रहीं मुक़ामें ए बेक़ार जवानी!

हमनें भी दिल से जुदा किया था छुपा के हर आँसू,

आँखों ही आँखों में दे दी दुवाएँ हुईं कैसी ए रवानी!

ग़म ए जिंदगी का लिये हर तरफ़ ए ख़ुदा देखा था,

ना जवानी ना कहानी कोई हर तरफ़ एक वीरानी!

हम तेरे और तेरे हम यह थी सिर्फ़ कहने की क़समें,

वह सारे ख़्वाब ख़याल बन के रह गयें एक जुबानी!

झ़ील पर सजाई हैं हँसीन बारात फूलों की किसी ने,

चोट खाईं थी दिल ने क्यूँ आँखों से छ़लका ए पानी

हर सुबह करते हैं हम नये जमाने की शुरुआत क्यूँ,

जो बीत गया वह हर रात वह हर याद ताज़ा पूरानी!

ह़सरत

तुझको पाने की हसरत में हम राहें भूल गए हैं,

कहने को हैं दोस्त दोस्तों की बाहें भूल गए हैं!

तेरी आँखों की मिश्री में यह खामोशियाँ कैसी,

घर से निकले थे मनाने मगर बातें भूल गए हैं!

हमनें फिजा ओं में हर तरफ़ है पाया तुझको,

जान बाकी है बस खुशबू हैं सांसें भूल गए हैं!

जिधर भी कह दिया उधर हम भी चलें लेकिन,

पत्थरों से थे जुदा करना वह काँटे भूल गए हैं!

हमें बुजुर्गों ने सुनाया था के तेरी मंजिल क्या है,

उनके जुबाँ की वह कहानी वह रातें भूल गए हैं!

नाम से ही हैं सारे काम कौन आया गया क्या,

कौन हैं अच्छा और कौन बुरा नातें भूल गए हैं!

चलते चलते हम भी तो चलें है झ़ील की तरफ़,

ग़म ए जिंदगी का हम कैसे बताएँ भूल गए हैं!

Lunar

ख़ुदा हो तुम या आईना या फ़िजा ओं की ख़ुशबू,

सच हो तुम या हो सराब़ या इस दिल की आरजू!

हो माहताब़ सबसे हँसीन दुनिया में ना और कोई,

ढूँढा तुम्हें हर एक पहर में है इस दिल की जुस्तजू!

झूठ ही सही फ़िर लौट कर मिलने ज़रूर आईयेगा,

बाइज्ज़तें दौर से बचाइये है इस दिल की आबरू!

ग़म है क्या ना देखूँ उसे या मैं हँस कर पिलूँ उसे,

तुम हो तो क्या पिलूँ ज़हर है इस दिल की हरसू!

आँखें तुम्हारी है क़ातिलाना जाम से क़म तो नहीं,

मिट जाते हैं यह सारे रास्ते युँ होतें हैं जब रूबरू!

ज़रा ठ़हर कर वक्त़ को कभी कभी बताया करों,

ग़में इश्क़ में है यह शायर झ़ील है दिल से मजबूर!

झ़ील

हरसू = ख़ुशी

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दिल कि बातें

कभी दिल के जख़्म को गले से लगा कर देखिए,

वह नहीं तो क्या हुआ ख़ुदा से मिला कर देखिए!

ग़म ए जिंदगी में ग़म नहीं तो जिंदगी भी क्या है,

रंग ए उल्फ़त का पाया है तुमने भूला कर देखिए!

दिन ए आफ़ताब गुज़रता है रक़ीबों से मिल कर,

रात भर दिल में अपनी चिराग़ जला कर देखिए!

किसने देखें नहीं क्या है ख्व़ाबों ख़याल दिल के,

समझदारों को इश्क़ ए सराब़ पिला कर देखिए!

हमनें दिल से उनकों भी क़रिब महसूस किया है,

झ़ील के किनारे पे जरा सा चाँद बुला कर देखिए!

ग़ालीब़ साहब़

अल्फ़ाज़ में सजाई है क़ायनात होगा ख़ुदा कोई,

ख़ुदाया ए ज़मीन पे था राहग़ीर जैसे जुदा कोई!

जिनकी शायरी में उलझ़ गया दीवाना हर कोई,

हर प्यासे की होठों पे मिला है जैसे मैक़दा कोई!

उन्होंने उछालें हैं शेर कई रियासत ए दरबार में,

ख़ुश यहाँ है कौन भला हर एक ग़मज़दा कोई!

यह जिंदगी भी क्या जिंदगी है मासूम सी है मगर,

जिते जी मिलीं है हर सभी को जैसे सज़ा कोई!

उनकीं बातें पढ़ कर के हम अब भी ख़यालों में है,

कई राज़ उलझ़े नहीं ख़ता होकर ली है रजा कोई!

झ़ील

एक मोड़ ऐसा भी

एक मोड़ आया था रास्ते में रास्ता सा रह गया,

किसी अन्जान से मिल कर सस्ता सा रह गया!

एक हँसीन अदा देख कर ख़ुदा से माँग लिया,

धूप में कड़ी बडी देर तक बरसता सा रह गया!

देखिए कि हर मोहब्बत में है ख़याल ही अच्छे,

उम्र भर प्यासे की तरह मैं तरसता सा रह गया!

बहोत आसान है दोस्त किसी से दिल लगाना,

दिल्लगी में जाने अब तक खस्ता सा रह गया!

झ़ील ख़ामोश उस रास्ते पर उलझ कर रह गया,

आईना बना कर मोतियों का हँसता सा रह गया!

अंदाज़

अंदाज़ ए बयाँ कुछ ऐसा है उनका के हम हम ना रहें,
कह दो के ठ़हर जाओ जरा जिंदगी में ग़म ग़म ना रहें!

पुछ लो के आईने क्यूँ लगता है वक्त़ सँवरने के लिए,
वक्त़ वक्त़ है गुजर रहा है वह कहीं क़म क़म ना रहें!

हमनें भी पढ़ ली है क़िताबें उनकीं जो समझाते हैं हमें,
सुर्ख़ लबों से लिपट कर ए पन्ना कहीं नम़ नम़ ना रहें!

रिश्तों ने लगाई है गुहार के जमाने से निपट जायें जरा,
तुझे याद करतें करतें ये चाँद मेरे कहीं तुम तुम ना रहें!

उम्र भर तुझ पर लिखतें लिखतें दीवाने ना बन जाए,
बरसात जैसा मन मोह लिया है कहीं छम छम ना रहें!

झ़ील

कैसे बताऊँ

हमनें तुझको जमाने से छुपा कर रखा है,

ख़्वाबों और ख़यालों में बुला कर रखा है!

दे दे तेरा हाथ हाथों में के तसल्ली पायें,

इन वादियों ने पहले से धुवाँ कर रखा है!

उम्र गुजार दी हमनें तुझको ढूँढने में ही,

फ़िर भी हमनें दिल को नौजवाँ रखा है!

हमनें चाहा है तुमको ख़ुदा से भी जादा,

इस लिये नाम तुम्हारा हमनें दुवा रखा है!

लग ना जायें जमाने की नज़र तुझको,

इस लिये क़रीबी वालों से जुदा रखा है!

मौत ना आये कहीं तुझे मिलने के पहले,

हमनें इसी लिये सराबों में घुलाये रखा है!

प्यास बढ़ाती हैं यह सारी यादें हर वक्त़,

हमनें शराब को पानी में मिला रखा है!

झ़ील सुनता था अगर यह अनकही बातें,

हमनें क़ातिल को आँखों में छुपा रखा है!

झ़ील

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