प्यास

दिन में सितारों को बुलाने वाले,

क्या लिखूँ रात को जगाने वाले!

इतनी ख़ामोशी अब तक न थी,

जिंदगी ए जिंदगी बदलने वाले!

चला ही जाता मैं इस शहर से,

नाम इस दिल पे लिखने वाले!

क्या करूँ मैं किस तरफ़ देखूँ,

ख़ुशबू हवाओं में मिलाने वाले!

चर्चा अपना सारे आम हुआ है,

यह चेहरा परदे में छुपाने वाले!

बता दो हमें जरा सा मज़हब,

किस को चुन ले बनाने वाले!

दर्द़ सिमटकर निकले थे घर से,

ख़ुद को ही समंदर कहने वाले!

खेल तक़दीर का होता अगर,

तु न मिलता था पिलाने वाले!

मैंनें रूख़सत किया था तुमकों,

दिल में ए चिराग़ जलाने वाले!

मेरे घर से तेरी गली दूर तो नहीं,

हर कदम पे रूक कर चलने वाले!

झ़ील एक नहीं है होंगे हजारों,

मदिरा में बर्फ़ सा छ़लकने वाले!

अक्स

मैं चला जाता हूँ जहाँ जहाँ तेरा अक़्स दिखाई देता है,

छुपा लूँ जमाने से मैं कितना भी जख़्म दिखाई देता है!

हम अपने दोस्तों को मिलनें चलें जाये क्यूँ बताओं तो,

चुप ही होते हैं पर होठोंपे उनकी बज़्म दिखाई देता है!

आईना है जैसा बना दिया है हमनें अपना घर लेकिन,

जब भी देखूँ यह सूरत आँखों में अश्क़ दिखाई देता है!

रात ख़ामोश बेज़ुबान हैं और सितारें चिराग़ो से रोश़न,

ख़ुशबूसे महकता है बिस्तर सामने हश्र दिखाई देता है!

यह जिंदगी ए मोहब्बत तो ख़ुदा की अमानत है मगर,

यह जमाना इश्क़ वालोंसे बहोत सख़्त दिखाई देता है!

हम अकेले ही तनहाईयों में यह सफ़र बितायेंगे मगर,

चलतें चलतें बार बार ए उम्र ए वक्त़ दिखाई देता है!

हर एक शाम सुबह मै झ़ील के किनारे ठ़हर जाता हूँ,

देखता हूँ जब अक़्स तुम्हारा मुझे सब्र दिखाई देता है!

हश्र

देखूँ तुझको ही मैं अगर न देखूँ तो हमसफ़र ही क्या,

तेरी ख़ुशबू से अगर सांस ही न चलें तो हश्र ही क्या!

तिर ए दिल पे मेरे क्या चलाया हैं तुने ऐ हमनबी मेरे,

ज़हर ही अगर जिंदा रख दे मुझको तो असर ही क्या!

तेरी मौजूदगी हैं ख़ामोशीयों में जो रात रोशन कर दे,

हर एक शेर न लिख दो चिराग़ो में तो बसर ही क्या!

क़तरा क़तरा खुन से अगर अलग अलग कर दे कोई,

नाम इश्तेहार ए मोहब्बत पे न छपा तो ख़बर ही क्या!

मैं चला जाता हूँ जब भी जहाँ भी तेरा साँया होता हैं,

जो न रखें ख़याल ए दीवाने का तो वह नज़र ही क्या!

तुम चले आये अगर सारी दुनिया ही छोड़ कर कभी,

तु मुस्कुरा दे और बहार ही न खिलें तो शज़र ही क्या!

उम्र ए कैद़ मेरी तब जाकर हुई हैं ऐ हँसीन ए क़ातिल,

क़सर है कोई नाम न आये तो झ़ील की क़ब्र ही क्या!

ग़वाहों के बयाँ

ग़वाहों के बयाँ भी कुछ ख़फा ख़फा निकले,

वफ़ा जिनसे की थी हमनें वह बेवफ़ा निकले!

फैसला तय था फिर भी प्यार झुकने न दिया,

हर तक़रार में हर एक रास्ते ही जफ़ा निकले!

हमनें इश्क़ किया हैं उनसे यह ख़ता है हमारी,

हमनें सोचा था हुआ वह के वह ख़ुदा निकले!

आँधीयों में रह कर एक उम्र गुजार दी हमनें,

सांस लेंगे जहाँ जहाँ नाम उनके सबा निकले!

रात ख़ामोश हैं मगर सितारों से भरी हुई हैं,

वह टूट कर मोतीयों से हजारों दफ़ा निकले!

उनकों खोने का ड़र था पहले मगर फ़िर भी,

झ़ील के अल्फ़ाज़ वह बन के अदा निकले!

आये गये बहोत मेरे घर हर वह दुकान वाले,

थी जरूरत राश़न की किताबें सफ़ा निकले!

जफा = अन्याय पूर्ण कार्य

सबा = हवा

सफ़ा = काग़ज़

क्यूँ न थोड़ा

घर से निकले थे तो यह सोचा की तेरे दर से जायें,

कहते हैं की सँवर गयें है क्यूँ न थोड़ा बिखर जायें!

आने वाला अब हर कोई थोड़ा यह सोचता होगा,

जायेगा हर कोई एक दिन क्यूँ न इधर उधर जायें!

दाग़ कितने भी क्यूँ न हो चाँद पर मगर फ़िर भी,

देख के शरीफों को ख़ुद क्यूँ न थोड़ा सुधर जायें!

आग़ लगीं हैं चारों तरफ़ के हम हैं मुसाफ़िर जैसे,

समझ जायेंगे लोग सारे ही क्यूँ न थोड़ी उम्र जायें!

बातें वह करते तो हैं मगर वह सारी हैं आसमानी,

बैठ़ के किनारे पे झ़ील में क्यूँ न थोड़ा उतर जायें!

माँगने वाला होता हैं उसे ख़ुदा कभी देता नहीं है,

चलतें चलतें शहर से क्यूँ न दूर निकल कर जायें!

उसने सोच लिया हैं अगर रास्ता तो कोई बात नहीं,

मिलीं हैं जिंदगी तो क्यूँ न थोड़ा निलाम कर जायें!

नन्ही सी बातें

वह लम्हे वह गली वह धूप वह रास्ते आसमानी,

नन्ही सी बातें हर ज़ुबाँ पे वह छोटी सी कहानी!

वह दिल भी क्या दिल थे मासूम थे बहोत मगर,

हर समय चूरायें हैं आँखों से किस्से बडे शैतानी!

रंग रंग में दंग होकर कठपुतलियों का सँवरना,

फिर कोई राधा आयें कान्हा की मीरा दीवानी!

वह शरारत वह हँस कर खेल खेल में ही रोना,

खाकर वह वह झूठी कसमें बेसबब सी जुबानी!

वह छोटे से ख्व़ाब नादाँ बहोत बारिश की तरह,

आज धूप हैं मगर थी वह सब से हँसीन जवानी!
झ़ील

इस दिल का क्या

आते हो तुम जब जी चाहता हैं तुम्हारा

मगर हाल ए दिल का क्या,

वादा किया हैं यह निभायें जरूरी तो नहीं,

मगर सवाल ए दिल का क्या!

तु हैं तो हैं मेरी हर एक आरजू तुझसे

मगर न जाने हैं यह डर कैसा

यह दुनिया ही एक क़ातिल ज़हर हैं

मगर ख़याल ए दिल का क्या!

किस किस को मिलायेंगे नजर और

किस किस को दे हम सफाई,

बदनाम ए मोहब्बत नाम हैं शहर का

मगर बवाल ए दिल का क्या!

बडी बेवफाई कर दी मुन्तज़िर तुने

मासूम ए जिंदगी का क्या,

ग़म नहीं है यह की मैं ही चाँद बन जाऊँ

मगर हवाल ए दिल का क्या!

कभी इस शहर तो कभी उस डगर तुम

ठ़हरे हुए इस झ़ील का क्या,

तुम्हारी ख़ुशबू हैं यहाँ ख़ुशी हो या न हो,

मगर ईमान ए दिल का क्या!

आता तो भी कैसे!

अगर साहिल की तरफ़ कोई आता तो भी कैसे,

जहाँ ग़म ही ग़म है कोई ठ़हरता तो भी कैसे!

सब कुछ तो हैं फिर भी बहोत नमीं सी लगती हैं,

मासूमियत से बदलती हैं रेत गुज़रता तो भी कैसे!

आकर निकल गया यहाँ से हर कोई अपनें रास्ते,

लौटकर फ़िर से हर कोई टहलता तो भी कैसे!

वह छोड़ कर आयें सारे नयें नयें ख्व़ाब लेकर,

उनकी बातों में आकर मैं बहकता तो भी कैसे!

रास्ते बंद कर दिये हैं राहों में पत्थ़र बिछा कर,

नादाँ झ़ील लहरों से ख़ुशबू चुराता तो भी कैसे!

Romancing

हल्के से कोई पास से कुछ बात कह गया है,

गया गया दूर बहोत बस आवाज़ रह गया है!

जख़्म तो है मगर हम किस किस को दिखाते,

हैं बहोत ही हँसीन यह भी ईलाज़ रह गया है!

पढ़ली हैं क़िताबें सारी कुछ भी तो रहा नहीं,

इश्क़ से करते करते परदा नमाज़ रह गया है!

हमनें भी सीख़ लिया है सज़धज़ के निकलना,

मिल गया हर ईनाम मगर सरताज़ रह गया है!

रक़्खें है उसने अपने हिसाब़ ए क़िताब सारें,

हर काम निकले सही बस अंदाज़ रह गया है!

इतना भी हँसीन कोई दुनिया में होता नहीं है,

समझा हर किसी ने ख़याल आबाद़ रह गया है!

देख के उन्हें ख़ामोशी रास्ते से चल पडीं है,

फ़ैला हुआ है उज़ाला ए चिराग़ रह गया है!

झ़ील

कोई तो वज़ह होगी

हमनें पुछा था वफादारों से के हमारी सजा क्या है,

बेवफ़ा हम भी हैं तुम भी हो इसकी वजह क्या है!

जिंदगी ए जिंदगी रखना ख़याल रकीबों का जरा,

हैं वह भी नाराज़ अगर तो जीने का मजा क्या है!

उनकों फ़ुरसत हैं कहाँ दैर ओ हरम में रहने वालों,

इश्तेहार में वह आये तो पुछ लो यह रजा क्या है!

हम जब ठ़हरे झ़ील पे तो सब ने पूछा किया उनसे,

ख़ुशबू है यहाँ हर तरफ़ ए ख़ुदा माजरा क्या है!

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