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पूछो

कभी हँसने का कोई मुझको मतलब तो पूछो,
दिल में छुपाये हैं दर्द़ कितने आज तक पूछो!

शाम आहिस्ता आहिस्ता सरहद़ पर चलती हैं,
हमनें देखा है हँसीन ए जवान माहताब़ पूछो!

मेरी सांसों में बसी है अभी तक उनकीं खुशबू,
इन फिज़ा ओं को मिलेगा वक्त़ जब तब पूछो!

हर किसी को नहीं होतीं एहसास ए मोहब्बत,
हमनें पाईं है यह हसरत ख़ुदा को ग़ुरबत पूछो!

मुझे ग़म नहीं ऐसा नहीं इसका ईलाज़ हैं कोई,
झ़ील ख़ामोश रहें तो बार बार हर बात पूछो!

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पूछो

कभी हँसने का कोई मुझको मतलब तो पूछो,
दिल में छुपाये हैं दर्द़ कितने आज तक पूछो!

शाम आहिस्ता आहिस्ता सरहद़ पर चलती हैं,
हमनें देखा है हँसीन ए जवान माहताब़ पूछो!

मेरी सांसों में बसी है अभी तक उनकीं खुशबू,
इन फिज़ा ओं को मिलेगा वक्त़ जब तब पूछो!

हर किसी को नहीं होतीं एहसास ए मोहब्बत,
हमनें पाईं है यह हसरत ख़ुदा को ग़ुरबत पूछो!

मुझे ग़म नहीं ऐसा नहीं इसका ईलाज़ हैं कोई,
झ़ील ख़ामोश रहें तो बार बार हर बात पूछो!

Absence कहाँ

जो नहीं होते हैं उनकीं हर वह बात करते हैं,
सामने रख कर आईना मुलाकात करते हैं!

वह ख़ामोश छत पर मिलता है कभी कभी,
न जाने क्यूँ हर एक दिन हम रात करते हैं!

जो बस में नहीं उसे पाने की तमन्ना रखते है,
लोग सुनते हैं कम जादा सवालात करते हैं!

दोस्ती वह कैसी जिस में फ़ासले न हो जाये,
दुश्मनों का क्या है जल्दी दो हाथ करते हैं!

कोशिश ए ग़ज़ल

कोशिश करते करते अब हम ख़ुद से हार गये हैं,

हम ही नही है अकेले शहर से कुछ और गयें हैं!

दिल धड़कने का सबब क्या मिला के क्या बतायें,

हर हाल में बात करते करते कुछ बिमार गयें हैं!

हम थे तो बहोत ख़ुश घर में उनके आने से पहले,

कुछ ज़रूरी होता नहीं है फ़िर भी बाज़ार गयें हैं!

मरीज़ ए दिल का हर शख़्स करता है हर ख़याल,

हर कोई सुबह शाम उनके दर से सौ बार गयें हैं!

मिला ही नहीं जब सुनने सुनाने पे समाचार कोई,

छोड़ कर झ़ील पिछे सरहद के उस पार गयें हैं!

देखा ही नहीं गया दोस्तों को यह हाल ए दिल मेरा,

लेकर हजारों तोहफ़े उनके घर मेरे ही यार गयें हैं!

तेरी नज़दीकीयाँ : गीत

तेरी नज़दीकीयाँ मुझको तुझसे दूर करने लगीं हैं,
ख्व़ाबो ख़यालों की यह मजबूरियाँ बढने लगीं हैं!

जब पास होते हो तुम तो दिल ए धड़कता हैं मेरा,
मेरे जिस्म की यह आहोशीयाँ भी भड़कने लगीं हैं!

हो ना हो तुम मेरे साथ यूँ उम्र भर फ़िर भी मगर,
यह दूरियाँ भी कुछ हद तक मगर तरसने लगीं हैं!

दर्द़ सिमटकर निकले थे घर के हर एक कोने से,
जब लगे हाथ खत सारे हर दीवारें गिरने लगीं हैं!

तेरे माथे का चमकता चाँद मुस्कुराता हैं जब देखूँ,
झील ने सँभाली थी माला ए अब बिखरने लगीं हैं!

इश्क़ भी क्या है

यह कैसे होता हैं कौन जाने दिल में दर्द़ सा होता हैं,
धीरे धीरे आँखों की झ़ील में हम जर्फ़ सा होता हैं!

तुम सामने आते हो जब यह नज़र कहीं जातीं नहीं,
आँखों से बयाँ करतें हो पर अंग़ार ए बर्फ़ सा होता हैं!

एक चाहत तेरी आहट है जैसे सूरज की पहली किरण,
हर जख़्म ग़हरा दिल पर अपने एक सर्द़ सा होता हैं!

तेरी राह देखूँ हर ख़ामोशीयों में एक जुर्म सा होता हैं,
चिराग़ ए रोशन हैं दिल में हर तरफ़ गर्द़ सा होता हैं!

झोंका हवा ओं का हर रोज़ यहाँ एक नर्म सा होता हैं,
आज कल यह हर वक्त़ जैसा एक हर्फ़ सा होता हैं!

मैं कुछ

तुम्हारी झ़ील सी आँखों में कुछ इस तरह खोया हुआ हूँ,
किसी ख़याल ने छुआ नहीं कुछ इस तरह सोया हुआ हूँ!

जख़्म ए दिल से आह भी न निकले इश्क़ ए चीज़ क्या हैं,
बिखरे हुए मोती समेटकर मैं कुछ इस तरह रोया हुआ हूँ!

हर फ़िज़ा में हर तरफ़ से आतीं हैं सौंधी सी ख़ुशबू तेरी,
कोहरे बादलों में सांसों को कुछ इस तरह बोया हुआ हूँ!

बारिशों का असर दिन ब दिन ए गहरा होता चला गया है,
अश्क़ ए ग़म ए ख़ुशी समंदर के पानी में मिलाया हुआ हूँ

नफ़रत यूँ ही नहीं जागती हैं अपने रिश्ते दारों की दोस्तों,
ख़ाक़ होकर कब्र जैसा कूछ इस तरह रह गया हुआ हूँ!

नज़्म

वह मुझे जब दूर तक ले गया था,

देख कर वह चाँद भी मुस्कुरा था,

जाते जाते वह आँसू दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

आँखों हीं आँखों में करता था बातें,

मै गया था काम से वह ऐसे इशारें,

वह घड़ी वक्त़ मुझको दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

वह मेरे आगे दो क़दम चलता रहा,

कुछ सुनाया कुछ सुन लिया था,

जाते जाते अपनी जुबाँ दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

वक्त़ निकला था जब अपने घर,

मेरे कंधे पर था जब उसका सर,

वह मुझे अपनी सांसें दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

यह फ़िजा उनकीं सबको है पता,

ऐ हवा उनका ठिकाना तो बता,

हँसते हँसते वह रूला के गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

नाम उनका होठों पर हैं बज़्म में,

जिक्र आया महफिल ए नज़्म में,

झ़ील को एक ग़ज़ल दे गया था!

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

धूप छाँव

अगर वह न मिलता शायद तो हम सोचते ही क्या,

दर्द़ छुपा के दिल में अपनें हम मुस्कुराते ही क्या!

देख कर उनकों ही तो दिल नें ए तय कर लिया था,

उनकी हर ख़ुशी हम जाते जाते रोकते ही क्या!

जाये भी तो कहाँ हम अपने जख़्म छुपाने के लिए,

हर क़दम पे साँया उनका हम मिटाते ही क्या!

कौन है बता ओं जरा सा किसी ने इश्क़ न किया,

क़ाग़ज के फूलों से ख्व़ाब हम सजाते ही क्या!

खाली पडा है कितने दिनों से वजुद चार दिवारी में,

ख़ामोशीयों में दिल का चिराग़ बुझाते ही क्या!

हम आये हैं बार बार मोहब्बत ए महफ़िल में मगर,

टकरा के मैक़दा ए भ्रम हम फ़िसलते ही क्या!

है धूप फ़िर भी कभी कभी छाँव सी लगती हैं मुझे,

झ़ील किनारे जख़्मों के फूल खिलते ही क्या!

दिल कि अदालत

तुझको मिलने की मुझको मिलीं इजाज़त भी क्या हैं,
जिसने सुनाई सजा मरने की वह अदालत भी क्या हैं!

जिनके तलबग़ार थे ऐ झ़ील अगर वह नहीं तो क्या है,
उम्र भर माँगी दुवायें ख़ुदा से यह इबाद़त भी क्या है!

है फ़ुरसत कहाँ वक्त़ को आजकल अपनों के ख़ातिर,
बहोत हँसीन हैं मगर फ़िर भी ए शिकायत भी क्या है!

वक्त़ ने मुझको कभी भी सोने न दिया वह रात कैसी,
हर रात ए दिन आया समाचार यह रवायत भी क्या है!

हर एक बार हर नया किस्सा ए ग़म अब कौन सुनेगा,
जब रखें फ़ासला ख़ुदा ही वह इंसानियत भी क्या है!

लोग दूर दूर बज़्म में पूछते हैं एक दूसरे को मेरी बातें,
जख़्म ए दवा है नहीं तो बाजारों ज़रूरत भी क्या है!

आये हैं तो जायेंगे हम ख़ुशी ख़ुशी जमाने से लेकिन,
मिलीं है नसीब से जमीन दो ग़ज़ अमानत भी क्या है!