नज़्म

वह मुझे जब दूर तक ले गया था,

देख कर वह चाँद भी मुस्कुरा था,

जाते जाते वह आँसू दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

आँखों हीं आँखों में करता था बातें,

मै गया था काम से वह ऐसे इशारें,

वह घड़ी वक्त़ मुझको दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

वह मेरे आगे दो क़दम चलता रहा,

कुछ सुनाया कुछ सुन लिया था,

जाते जाते अपनी जुबाँ दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

वक्त़ निकला था जब अपने घर,

मेरे कंधे पर था जब उसका सर,

वह मुझे अपनी सांसें दे गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

यह फ़िजा उनकीं सबको है पता,

ऐ हवा उनका ठिकाना तो बता,

हँसते हँसते वह रूला के गया था,

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

नाम उनका होठों पर हैं बज़्म में,

जिक्र आया महफिल ए नज़्म में,

झ़ील को एक ग़ज़ल दे गया था!

वह मुझे जब दूर तक ले गया था!

धूप छाँव

अगर वह न मिलता शायद तो हम सोचते ही क्या,

दर्द़ छुपा के दिल में अपनें हम मुस्कुराते ही क्या!

देख कर उनकों ही तो दिल नें ए तय कर लिया था,

उनकी हर ख़ुशी हम जाते जाते रोकते ही क्या!

जाये भी तो कहाँ हम अपने जख़्म छुपाने के लिए,

हर क़दम पे साँया उनका हम मिटाते ही क्या!

कौन है बता ओं जरा सा किसी ने इश्क़ न किया,

क़ाग़ज के फूलों से ख्व़ाब हम सजाते ही क्या!

खाली पडा है कितने दिनों से वजुद चार दिवारी में,

ख़ामोशीयों में दिल का चिराग़ बुझाते ही क्या!

हम आये हैं बार बार मोहब्बत ए महफ़िल में मगर,

टकरा के मैक़दा ए भ्रम हम फ़िसलते ही क्या!

है धूप फ़िर भी कभी कभी छाँव सी लगती हैं मुझे,

झ़ील किनारे जख़्मों के फूल खिलते ही क्या!

दिल कि अदालत

तुझको मिलने की मुझको मिलीं इजाज़त भी क्या हैं,
जिसने सुनाई सजा मरने की वह अदालत भी क्या हैं!

जिनके तलबग़ार थे ऐ झ़ील अगर वह नहीं तो क्या है,
उम्र भर माँगी दुवायें ख़ुदा से यह इबाद़त भी क्या है!

है फ़ुरसत कहाँ वक्त़ को आजकल अपनों के ख़ातिर,
बहोत हँसीन हैं मगर फ़िर भी ए शिकायत भी क्या है!

वक्त़ ने मुझको कभी भी सोने न दिया वह रात कैसी,
हर रात ए दिन आया समाचार यह रवायत भी क्या है!

हर एक बार हर नया किस्सा ए ग़म अब कौन सुनेगा,
जब रखें फ़ासला ख़ुदा ही वह इंसानियत भी क्या है!

लोग दूर दूर बज़्म में पूछते हैं एक दूसरे को मेरी बातें,
जख़्म ए दवा है नहीं तो बाजारों ज़रूरत भी क्या है!

आये हैं तो जायेंगे हम ख़ुशी ख़ुशी जमाने से लेकिन,
मिलीं है नसीब से जमीन दो ग़ज़ अमानत भी क्या है!

Romance

लगीं ठ़ोकर मुझको तब जाकर कहीं अक़्ल आई हैं,

कर दी नुमाईश आईने की तो कहीं शक़्ल आई है!

हमनें कर दी जब शिकायत जाहिर ख़ुदा से दोस्तों,

मेहमान ए नवाजी में तब कहीं हर दख़्ल आई है!

देखते देखते चुप के से हर रंग सारे उनके चुराये हैं,

तब कहीं मुझको उनकी हुब हुब नक़्ल आई है!

ख़ुश उनकों करते करते ही उम्र गुजार दी मनाने में,

जाकर के तब कहीं यह शाम मख़मली आई हैं!

पहले पहले वह हँसीन बारात फूलों से सजाई हमनें,

हँसते हँसते तब कहीं लाईबाह मेरे मुल्क़ आई हैं!

झ़ील

क्यूँ न जाने

हमनें देखीं वह निगाहें खोई खोई क्यूँ न जाने,

तसवीर दिल के आईने में सजाई क्यूँ न जाने!

बाद यह मुद्दतें मिला कोई ऐसा जख़्म मुझको,

बिन पूछे ही मिला हैं ऐसा सौदाई क्यूँ न जाने!

हमनें माँगी थी दुवाएँ रात दिन जिनके ख़ातिर,

मिलने के पहले मिली यह जुदाई क्यूँ न जाने!

हमनें उनकों यह कहा नहीं ऐतबार कर लेना,

दर्द़ से इश्क़ की चिंगारी ए जलाई क्यूँ न जाने!

भूल करते रहें हम उनसे मोहब्बत करने की,

जाने किस में है किस की भलाई क्यूँ न जाने!

कब जमाना था अच्छा कोई मुझको बताओं,

सब की आद़त हैं सब की बुराई क्यूँ न जाने!

वह समझदार है बहोत यह ख़ुदा ने कह दिया,

झ़ील की यह इबाद़त है हरजाई क्यूँ न जाने!

दोस्त बन बन कर निकले दोस्तों लूटने वाले,

किस किस को दे हम यह सफ़ाई क्यूँ न जाने!

जरा जरा सा

जरा जरा सा चाँद मुड़ के देख लेता कभी तो,

जो हमनें दिया है दिल आज़मा लेता कभी तो!

हम उम्र भर ए अब इंतज़ार तेरा तो कर ही लेंगे,

जरा जरा सा उतर कर जमीन पे आता कभी तो!

तु क्यूँ हैं इतना ख़ामोश ए दिल बताओं तो सही,

तु देकर मुझको आँसू तेरे जरा हँसता कभी तो!

यह जिंदगी ए ग़म ए इश्क़ से बाहर तो निकलूँ,

इस अंजुमन में दो क़दम साथ चलता कभी तो!

बहोत खूब हुआ है चर्चा सारे किताबों में मगर,

उस पार सही झ़ील के किनारे मिलता कभी तो!

जो बात है तुझ में और किसी में नहीं क़ातिल,

सराबों में आता प्यास बुझाने मैक़दा कभी तो!

किस किस को सुनायें हम हाल ए दिल अपना,

मिला ज़र्रे ज़र्रे में नशा आँखोंसे पिलाता कभी तो!

सृष्टि का नियम

हरे पत्तों का रंग वक्त़ के साथ साथ बदलते हुए देखा है,

हमनें भी हर ख्व़ाब ए ख़यालों को बिख़रते हुए देखा है!

जितने भी आये जमाने कुछ कर दिखाने की उम्मीद से,

किया बहोत शराफ़त से उनकों भी गुज़रते हुए देखा है!

चाँद और सूरज ने मोहब्बत को मिल बाँट के जिंदा रखा,

हर सुबह और हर शाम को फ़िर भी सुलग़ते हुए देखा है!

यह जिंदगी तो एक सहरा हैं धूप में निकलती रहती है,

फ़िर भी एक ख़ामोश आईने को मुस्कुराते हुए देखा है!

जिंदगी की ख़ोज में निकला हमसफ़र वहीं का रह गया,

एक बुढी माँ के आँचल को भी हमनें तरसते हुए देखा है!

पानी पानी कहतें कहतें हर गाँव कहाँ से कहाँ तक गया,

बेवज़ह बरसात से इन हर किसानों को मरते हुए देखा है!

आँसू छुपा कर हँसते हँसते जीने की आद़त हैं झ़ील को,

हर सुबह छाँव को सूरज की तरह सरक़ते हुए देखा है!

जख़्म मज़हबी

सर से ज़मीन बढ़ गयी फ़िर भी कुछ न सीख़ा हमनें,

ऊँगलियाँ उठ़ाते रहें जन्नत में कुछ भी न देखा हमनें!

आँखों से अपनी अगर कुछ शराफ़त भर कर लेता,

गिर कर अब ख़ुदा की नज़र से गँवाया मौक़ा हमनें!

सख़्त हैं वह कहते कहते उनसे उम्र भर दूर रह गयें,

जिस ने बनाया था हमें दिया उनकों ही धोख़ा हमनें!

अपनों को छोड़ कर सारे गैरों से हाथ मिलायें हमनें,

ज़हर पिते पिते रहें जिंदगी का मज़ा न चख़ा हमनें!

सब के सामने वह ख़ुद मज़हब के नारें लगाता रहा,

ड़राया हाथों में शस्त्र लेकर फ़िर भी न रोका हमनें!

बदन पर लिपटा लहू जैसा मज़हबी ए साँया हमारें,

हार गया इंसानियत से फ़िर भी न उसे फैंक़ा हमनें!

सदियाँ बीत गयीं हैं फ़िर भी न बाज़ आयें हो तुम,

ख़ुदा ए सलामती के सिवा कुछ भी न माँगा हमनें!

झ़ील

सर्वसाधारण

काश़ होता यह सफ़र आसान तो तेरे नाम सा होता,

धूप है सहरा है यह जिंदगी फ़िर भी छाँव सा होता!

लेकर के हम जख़्म सारे निकलते हैं हर रोज़ घर से,

वह माथे का चढ़ता सूरज हर दोपहर चाँद सा होता!

रात ख़ामोश हैं यह तो अब हैं सिर्फ़ कहने के लिए,

चारों दीवारें ए दरवाजे पे मुस्कुराता शाम सा होता!

हम भी बैठे हैं कई बार अकेले बज़्म में ऐ क़ातिल,

पिते पिते पानी तेरी यादों में हर घूँट जाम सा होता!

मिलता है हर कोई यहाँ तो सिर्फ़ मतलब के ख़ातिर,

हैं तो हैं ख़ुदा सब यहाँ वरना इन्सान गाँव सा होता!

देखता हूँ मैं जब भी जहाँ जहाँ शक़ देखता है मुझे,

वरना शहर में भी इस मैं भी तो एक आम सा होता!

जिसने पुछा किया हमसे हम उनकें काम तो आयें,

करते हर काम का सौदा तो ए झ़ील दाम सा होता!

भूली बिसरी कहानी

भरी रात बरसात में दिल दिल से मिल गया,

एक चिंगारी क्या लगीं सारा शहर जल गया,

वह अदा ही क्या हँसीन हैं हर कोई दीवाना,

दूर ही था बला से मगर कैसा जादू चल गया!

वह चाँद जमीन पे था जो मुझे लूट कर गया,

इसी बिस्तर पर था सुबह कैसे निकल गया!

मैं आज भी यही सोचता हूँ सोचता हूँ मगर,

गया वह ख्व़ाब गया मगर कैसे ए दिल गया!

शुक्रिया कहूँ उसे या मोहब्बत का अफ़साना,

मिला था जो ख़ुद किस्मतसे कैसे बदल गया!

हमनें भी लगायें हैं चक्क़र झ़ील के किनारे,

जब भी देखा अक़्स पानी में पल पल गया!

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