ग़म ए जिंदगी

जिंदगी ग़म ए जिंदगी में जहर थोड़ा ही होता है,

चाहने वालों के हिसाब से क़म थोड़ा ही होता है!

चाहे पढ़ लेना कुरान चाहे गिता पढ़ कर देखिये,

हाथों की ऊँगलियों से पन्ना नम़ थोड़ा ही होता है!

बंद करों यह लडाई और कितना खुन बहाओगे,

ऐसे हथियारों के बाजुओं में दम थोड़ा ही होता है!

जो आया था गया होगा किसने किस को देखा है,

ख़्वाबों में से चल कर देखो भ्रम थोड़ा ही होता है!

जिसनें बनाया है तुझको उसने यह हिसाब रखा हैं,

ग़लती तु करता है इस में क़रम थोड़ा ही होता है!

कितना भी बदल लीजिए पंडित का पोषाख मगर,

दिल भी एक मंदिर हैं दैर ओ हरम थोड़ा ही होता है!

झ़ील

आवो तो सही

कभी तो फ़िर से जिंदगी में आवो तो सही,

किया है जो वादा तुमने निभावो तो सही!

तुम जुबान से कह दो तो हम मान जायेंगे,

जुदा जुदा सा यह दिल मिलावो तो सही!

हमने ख़मोशीयों में भी आवाज़ दी हैं तुम्हें,

नाम लेकर के अंजुमन में बुलावो तो सही!

हमने उम्र भर का तुझे ख़ुदा बना लिया हैं,

तुम अपने दिल में चिराग़ जलावो तो सही!

धूप हैं सहरा हैं हर तरफ़ यह जिंदगी मेरी,

मृगतृष्णा की यह प्यास बुझावो तो सही!

हमने सोचा था जो कभी आया ही नहीं है,

सुना दो साथ मगर वक्त़ बितावो तो सही!

हमने समझ लिया है के तुम चाँद हो लेकिन,

कभी उतर कर जमीन पर आवो तो सही!

झ़ील

Romantic ग़ज़ल

कभी तो मिलने की जरा फ़िर से बात किजीए,

अभी नहीं तो फ़िर कभी मुलाक़ात किजीए!

बहोत हँसीन हो तुम जैसे कोई माहताब़ हो तुम,

धूप में चलतें चलतें ही कभी बरसात किजीए!

जब साथ चलतें हो तो क़ायनात साथ होता है,

कभी आँखों से आँखों में जज़्बात किजीए!

हर एक ग़ज़ल में तुझसे हम यह परदा क्यूँ करें,

कभी तो जमीन पें आकर क़यामत किजीए!

घर से निकलने की इजाज़त तुझको नहीं मगर,

कभी ख़्वाब में जागने की क़रामत किजीए!

तुम ही आना मुझसे पहले उसी ही अंजुमन में,

उठा कर ऊँगलियाँ अपनी द़हशत किजीए!

रहो कहीं भी तुम जहाँ भी तुम चाहते हो मगर,

ग़रीब हैं दिल इस झ़ील पे रियासत किजीए!

झ़ील

किस तरह समझाऊँ

कोई तो समझायें के किस तरह जिया जायें,

ज़हर ए जिंदगी का किस तरह पिया जायें!

हैं मोहब्बत उनकों भी यह ख़बर है मुझको,

नाम यह महफ़िल में किस तरह लिया जायें!

बडी क़ातिल हैं अदा इस दुनिया में ऐ लोगों,

हक़ दोस्ती का अदा किस तरह किया जायें!

हर ख़याल हैं उनका और हर ग़ज़ल उनकीं,

ख़ुद को ही निलाम किस तरह किया जायें!

हमने सजाया है शज़र सिर्फ़ उनके ख़ातिर,

खुशबू ए सुर्ख़ फूल किस तरह दिया जायें!

कोई पंडित बन कर ख़ुदा घर में है मौजूद,

इश्क़ के रक़िब को किस तरह हराया जायें!

हमने मज़हब से एक दूसरे को बाँट लिया हैं,

ऐसे में हर इन्सान किस तरह मिलाया जायें!

ऐ ख़ुदा तुने बनाया है सब में एक रंग मगर,

झ़ील का रंग जुदा किस तरह बनाया जायें!

झ़ील

कभी तो

कभी ख़याल बन के मेरा मुझसे बातें किया करो,

दूर ही बैठे रहो मगर मुझसे आँखें मिलाया करों!

मुझको कोई ऐतराज नहीं तुम मेरे दुश्मन ही सही,

हाल जुबान से मत पूछो मगर हाथ मिलाया करों!

वह कहानी बहोत पूरानी एक चाँद रात सुहानी,

सहरा ए अंजुमन में रात भर दिये जलाया करों!

जान कर यह दर्द़ तुम अपना फैसला ना बदलो,

आते जाते दर से जख़्मों पर मरहम लगाया करों!

नाम नया दीवाना मेरा शहर वालों ने रख दिया है,

साल नया दिल नया पाठ दोस्ती का पढाया करों!

झ़ील

सच ही जाने

सच ही जाने सच क्या है झूठ तो बदलते रहता है,

लाख़ मिला लो हाथ उनसे दिल धड़कते रहता है!

रोशन कर लो घर अपना जब चाहे चिराग़ जला दो,

ख़ामोशी में बीन बरसात ही बादल बरसते रहता है!

ख़ुब बदल लो शक़्ल अपनी आईना सच कहता है,

शीशा ए दिल शीशे में ख़ुद दिल बहलातें रहता है!

सब कुछ तो ख़ुदा जाने बाकी तुम हम किरदार हैं,

चाँद हँसता है छुप छुप कर परदा सरकते रहता है!

मुझको अब यकिन हुआ है के यह ख़याल अच्छा हैं,

बहते हुए पानी में ख़ुद ब ख़ुद पत्थर बदलते रहता है!

झ़ील

ग़ज़ल

कौन जाने कौन कहाँ से,

एक रंग हैं सब जुबाँ से!

आयें थे सब दोस्त बनाने,

जख़्म देखा हुये खफ़ाँ से!

मुश्किल है पर ग़म नहीं है,

जिस दिन जायेंगे जहाँ से!

उनका कोई पैगाम नहीं है,

सारे ख़्वाब धुवाँ धुवाँ से!

दैर ओ हरम में उनकों सुनते हैं,

समझते हैं जो इन्सान ख़ुदा से!

आँख़ ए ऊदू झ़ील पें जैसे,

जमीन पे ठहरे हुए चाँद से!

क्या देश क्या भेद यारों,

यह हक़िक़ते बयाँ बयाँ से!

एक एक सब मिट जायेंगे,

नामों निशान मेरे यहाँ से!

जिसने दिल पे तिर चलाया,

लौट कर वह गया वहाँ से!

यूँ समझ लो आईना हो तुम,

शीशा फ़िर लगता है छाँव से!

दर्द़ का क्या है चलता रहेगा,

गुजरती है ख़ुशबू जैसे हवाँ से!

बेसबब हाल पूछता है हर कोई,

नया नया सा लगता है गाँव से!

धूप सहरा ख़ामोशी हर तरफ़,

इश्क़ दा ईनाम मिला है दुवाँ से!

झ़ील

कुछ तो बात है

कुछ दिन पहले की बात है, खामोशी की रात हैं,

हम दोनों मगर इस दुनिया से निजात हैं!

एक कहानी बन जाती है, ख़ुद पगली सी रहती हैं,

एक दूजे के वास्ते यह किरदार दोहात हैं!

सारा शहर है मतलबपरस्ती, कौन आया गया क्या,

मोहब्बत ए सराब़ ख़ुद ही में सौग़ात है!

हमने जिनका ज़िक्र किया, बस वह जुबाँ पें रहता हैं,

मीट गयें मिटने वाले हिर रांझा आबाद हैं!

बहोत हँसीन है यह दुनिया, तुम भी जीना सीख़ लो,

एक ख़ुदा हैं फ़िर भी ग़म हैं खुशियों पें आघात हैं!

सबको हैं रब़ दा वास्ता, नेकी कर दरिया में डाल दो,

दुश्मन हैं ख़ुदग़र्ज़ हैं जो इन्सान आज़ाद हैं!

सोच समझ के रखना क़दम, यह फिसलता रहता है,

जो करता है मोहब्बत वह तुझसे नाराज़ हैं!

झ़ील

जिंदगी ए जिंदगी

तुम अपना वास्ता जमीन से रखना सीख लो,

तुम अपना रास्ता खुद ही बनाना सीख लो!

हर शहर हर तरफ़ यहाँ रकीबों से है भरा,

दुश्मनों को अपना दोस्त बनाना सीख लो!

जिंदगी ए जिंदगी नाराज़ ना होना कभी मुझ पर,

ग़म ए दस्तूर है ए जिंदगी गले लगाना सीख लो!

मुक़ाबले में कभी हार कभी जीत हैं ए झ़ील,

तुम अपना हर आँसू आँखों में छुपाना सीख लो!

हमने माना हैं यह के जिंदगी धूप हैं लेकिन,

रात की ख़ामोशी यों को छाँव समझना सीख लो!

जो भी आया हैं जहाँ में भीतर से जूझ़ रहा है,

हर एक ग़म पे तुम सुकून से मरना सीख लो!

बिग़ड़ गया क्या उनका जिनका बिग़ड़ गया है,

बार बार गिर के जमीन पें सँभलना सीख लो!

कोई होता नहीं किसी का सारे रिश्ते ही झूठे हैं,

ग़म ए दिल से रिश्ता ख़ुद निभाना सीख लो!

जख़्म ए दिल हमेशा समंदर से भी बड़ा रखना,

दर्द़ छुपा कर पानी की तरह बहना सीख लो!

याद करना मुझको जब भी वक्त़ मिलेगा जरूर,

आऊँगा नहीं लौट कर सितारों में ढूँढना सीख लो!

झ़ील

कभी याद किया उसने

कभी याद कर के मुझको आँखों में सजाया उसने,

कभी दोस्तों में रकीबों से हाथ मिलाया उसने!

कभी आशार मेरा औरों को पढ़ कर सुनाया उसने,

कभी किताब ए पन्ना शोलों से जलाया उसने!

कभी ख़ामोश जगह चाँद बन कर बुलाया उसने,

कभी सितारों में चलतें चलतें सताया उसने!

कभी औरों की तरह मुझको भी समझाया उसने,

कभी मचलती हुई बरसात में भिगोया उसने!

कभी कर दिया परदा कभी गले से लगाया उसने,

कभी दुरिया बना के जादू ए तिर चलाया उसने!

कभी सवाल कर के हजार गुमसुम बनाया उसने,

कभी ग़म ए अश्क़ जाम ए जहर पिलाया उसने!

कभी वह ठहर गया झ़ील जैसा नदियाँ बन कर,

प्यास बढ़ा कर मुझको प्यासा बनाया उसने!
झ़ील

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