जिंदगी ए जिंदगी

तुम अपना वास्ता जमीन से रखना सीख लो,

तुम अपना रास्ता खुद ही बनाना सीख लो!

हर शहर हर तरफ़ यहाँ रकीबों से है भरा,

दुश्मनों को अपना दोस्त बनाना सीख लो!

जिंदगी ए जिंदगी नाराज़ ना होना कभी मुझ पर,

ग़म ए दस्तूर है ए जिंदगी गले लगाना सीख लो!

मुक़ाबले में कभी हार कभी जीत हैं ए झ़ील,

तुम अपना हर आँसू आँखों में छुपाना सीख लो!

हमने माना हैं यह के जिंदगी धूप हैं लेकिन,

रात की ख़ामोशी यों को छाँव समझना सीख लो!

जो भी आया हैं जहाँ में भीतर से जूझ़ रहा है,

हर एक ग़म पे तुम सुकून से मरना सीख लो!

बिग़ड़ गया क्या उनका जिनका बिग़ड़ गया है,

बार बार गिर के जमीन पें सँभलना सीख लो!

कोई होता नहीं किसी का सारे रिश्ते ही झूठे हैं,

ग़म ए दिल से रिश्ता ख़ुद निभाना सीख लो!

जख़्म ए दिल हमेशा समंदर से भी बड़ा रखना,

दर्द़ छुपा कर पानी की तरह बहना सीख लो!

याद करना मुझको जब भी वक्त़ मिलेगा जरूर,

आऊँगा नहीं लौट कर सितारों में ढूँढना सीख लो!

झ़ील

कभी याद किया उसने

कभी याद कर के मुझको आँखों में सजाया उसने,

कभी दोस्तों में रकीबों से हाथ मिलाया उसने!

कभी आशार मेरा औरों को पढ़ कर सुनाया उसने,

कभी किताब ए पन्ना शोलों से जलाया उसने!

कभी ख़ामोश जगह चाँद बन कर बुलाया उसने,

कभी सितारों में चलतें चलतें सताया उसने!

कभी औरों की तरह मुझको भी समझाया उसने,

कभी मचलती हुई बरसात में भिगोया उसने!

कभी कर दिया परदा कभी गले से लगाया उसने,

कभी दुरिया बना के जादू ए तिर चलाया उसने!

कभी सवाल कर के हजार गुमसुम बनाया उसने,

कभी ग़म ए अश्क़ जाम ए जहर पिलाया उसने!

कभी वह ठहर गया झ़ील जैसा नदियाँ बन कर,

प्यास बढ़ा कर मुझको प्यासा बनाया उसने!
झ़ील

चिराग़ ए दिल

जला दिया हैं आज चिराग़ ए दिल किसी ने,

तनहाईयों में बिताया है साथ ए हर पल किसी ने!

रात भर जागते रहतें थें सोचते सोचते हम,

अंजुमन ए ख़यालों से निकाला ए हल किसी ने!

बात करने की इजाज़त नहीं थी हमें मगर,

हाथ बढ़ा के कर दी हैं दोस्ती की पहल किसी ने!

कोई आया तो नहीं फिर भी क्यूँ लगा मुझे,

घर का दरवाज़ा खोल दिया हैं आज कल किसी ने!

बडी मुश्किल से दिल बच्चों सा रखा है झ़ील,

मेरे दिल पे दे दिया है जख़्म मुस्सलसल् किसी ने!

झ़ील

मुस्सलसल् = बार बार

माँ

मेरी ऊँगलियाँ पकड़ कर मुझे फ़िर चलना सीखा दे,

छुपा लेना आँचल में पहलें फ़िर सँभलना सीखा दे!

ग़म ही ग़म है शहर में हाथों में तेरी फ़िर भी नमीं है,

चला लेना लाठियाँ जितनी फ़िर मुस्कुराना सीखा दे!

तेरे हाथों की वह रोटीयाँ अब तक जुबांन पे हैं मेरी,

छुपा देना आचार कहीं फ़िर नज़र मिलाना सीखा दे!

हमने हर कदम ज़माने को आपस में लड़ते देखा है,

दरवाजे पे सुना देना सब कुछ फ़िर ठ़हरना सीखा दे!

रोने दो मुझे अब की बार आँसु ओं को भी बहने दो,

जीत जाऊँ मैं दुनिया अगर तो फ़िर बुलाना सीखा दे!
झ़ील

गीत ( दर्द़ )

हर तरफ़ हैं ग़म हवायें है थोडी सी क़म,

कोई हैं नाराज़ यहाँ आँख़ें रहतीं हैं नम़!

वह सुराग़ मिला न सुर्ख़ के तोड़ दे दम!

कोई बताये हाथों में हाथकड़ीयाँ किस तरह पहना दूँ,

दूर हैं उनकों याद किजिए दिल में कैसे बसाते हैं हम!

मेरे हाथों से टूट कर बिखर गई काँच की यह चूडियाँ,

दिल यह धड़कता रहा रात दिन तेरी आहट में सनम!

अब मैं किस तरह चुराऊँ उनके पलकों की सियाही,

देख कर न आया मोती उनकों नज़र बेहया हैं जन्म!

झ़ील

बारिश़

कहीं बारिश़ ने लपेटा इसी लिए चेहरा खिला तो नहीं,

कहीं आईना भी देख कर धुवाँ तुझ पर जला तो नहीं!

चाँद की रोशनी बढ़ा कर सितारों को मिलाया तो नहीं,

कहीं आफ़ताब देख कर आँखों से परदा गिरा तो नहीं!

क्या इंतज़ार ए ख़ुदा कोई नया क़लाम लाया तो नहीं,

कहीं छुप छुप कर कोरे कागज़ पे नाम लिखा तो नहीं

आपने भी बहायें होंगे कभी ग़म कभी खुशी के आँसू,

जो खोया हुआ था मोती समंदरसे फिर मिला तो नहीं!

हर किसी को थोड़े आते हैं आते जाते मिर ए ख़याल,

झील ने बनाई बिना पूछे ए ग़ज़ल कहीं गिला तो नहीं!

झ़ील

बहते हुए पानी में

बारिश़ के बहते हुए पानी में कैसे कैसे अरमान निकले,

कभी हार गयें कभी जीत गयें फिर कैसे अन्जान निकले!

कहानियाँ हमने भी सुनी सुनाई जो पुरखों से सुनी थी,

दिल धड़का था जब सामने फिर कैसे बेजुबान निकले!

मालूम था उनकों यह हम भी उनसे मोहब्बत करतें हैं,

आँसू लिये आँचल में अकेले फिर कैसे बेईमान निकले!

हमने ख़यालों को अपनी कभी माँ से भी छुपाया नहीं,

हमने तो सजाये थे नींद में भी फिर कैसे शैतान निकले!

बच्चों की जुबान पर हर क़सम ख़ुदा बन कर रहतीं हैं,

था वह मेरा ही अगर ख़ुदा तो फिर कैसे नादान निकले!

कहा मुझको मिल कर लोगों ने सब से अच्छा है क़रम,

जिसने देखा नहीं मुड़ कर फिर कैसे गुणवान निकले!

दैर ओ हरम में रहना झ़ील ने भी सीख लिया है मगर,

जिसनें पूछा न हाल ए दिल फिर कैसे कद़रदान निकले!

झ़ील

बहते हुए पानी में

बारिश़ के बहते हुए पानी में कैसे कैसे अरमान निकले,

कभी हार गयें कभी जीत गयें फिर कैसे अन्जान निकले!

कहानियाँ हमने भी सुनी सुनाई जो पुरखों से सुनी थी,

दिल धड़का था जब सामने फिर कैसे बेजुबान निकले!

मालूम था उनकों यह हम भी उनसे मोहब्बत करतें हैं,

आँसू लिये आँचल में अकेले फिर कैसे बेईमान निकले!

हमने ख़यालों को अपनी कभी माँ से भी छुपाया नहीं,

हमने तो सजाये थे नींद में भी फिर कैसे शैतान निकले!

बच्चों की जुबान पर हर क़सम ख़ुदा बन कर रहतीं हैं,

था वह मेरा ही अगर ख़ुदा तो फिर कैसे नादान निकले!

कहा मुझको मिल कर लोगों ने सब से अच्छा है क़रम,

जिसने देखा नहीं मुड़ कर फिर कैसे गुणवान निकले!

दैर ओ हरम में रहना झ़ील ने भी सीख लिया है मगर,

जिसनें पूछा न हाल ए दिल फिर कैसे कद़रदान निकले!

झ़ील

एक ऐसी बरसात

बरसात में भीगा हुआ सा हमने भी एक चेहरा देखा,

कभी रात के ख़ामोशी में हमने भी एक सेहरा देखा!

गालों पर लटों को ऊँगलियों से सँवारता हुआ चाँद,

धीमी सी जख़्मों का घाँव अपने दिल पे गहरा देखा!

देखा है जब से ए तारीकी उनकीं हँसीन निगाहों में,

आँखों से छ़लकता हुआ हमने जाम ए मदिरा देखा!

वह शौख़ हँसीन अदायें रहतीं हैं जमीन पर बलायें,

जिसनें भी देखा है उनकों उस में एक मोहरा देखा!

बातें हैं उनकीं ऐसी जैसे है किसी कातिल की जुबाँ,

नींद में मौत के सोने वालों ने रातों में सवेरा देखा!

ख़ामोश हैं यह हवा मगर उनकीं खुशबू हैं ए जवाँ,

ढ़लते हुए आफ़ताब का भी चारों तरफ़ पहरा देखा!

समंदर उलझ गया वह कुछ तिर ए शातिराना था,

पत्थरों ने ख़ुद दम तोड़ दिया पानी में तैरता देखा!

झ़ील

ग़ज़ल ( मुनासिब़ )

अब यह मुनासिब है झ़ील यहाँ वक्त़ गुजार दूँ,

अब ना मिल सका तो सजा ख़ुद को हजार दूँ!

वह अदायें उनकीं मेरी जो होश़ उडा लें गई हैं,

अब उनकें सुर्ख़ ए होठों को ख़ुद की मज़ार दूँ!

उसने मुझे इश्क़ ए ख़ुदा बन के निलाम किया,

वह खरीद़ें धड़कते दिल को ख़ुद ही बाज़ार दूँ!

अब ना कोई ग़म है मेरे आईना शीशा ए दिल,

तुझको दुवा देने ख़ुदा ख़ुद हर साल दीदार दूँ!

इस जिंदगी का उसूल है पा लिया खो दिया हैं,

तेरी ख़ामोशी ए ग़म के आँसु ओं को क़गार दूँ!

हमने इस तुफाँ को अपने दिल में समां लिया है,

जिस रेत पर लिखा था नाम हाथों से सँवार दूँ!

यह मेरे दोस्त तुम्हें अब ना कभी याद आऊंगा,

जब होगा दूसरा जन्म बहार बन कर सौग़ात दूँ!

झ़ील

क़गार = तट किनारा

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